भारत में संवैधानिक विकास#constitutional development in india

Constitutional development in india

भारत में  संवैधानिक विकास (Constitutional development in india)

⇒ किसी भी देश कें संविधान की रचना मात्र एक दिन की उपज नहीं होती है बल्कि देश की सतत् विकास का परिणाम होता है। भारतीय संविधान के एतिहासिक विकास का काल सन् 1599 ई. से शुरू होता है तथा उसी समय ब्रिटेन में ईस्ट इंडिया कम्पनी (East India Company) की स्थापना भी हुई थी।

⇒ ईस्ट इंडिया कम्पनी (East India Company) की स्थापना 1599 ई. में हुई। महारानी एलिजाबेथ ने एक राजलेख द्वारा 15 वर्षों के लिए व्यापार का अधिकार दिया, जिसे 1599 ई. का चार्टर कहा जाता है।

⇒ इस राजलेख द्वारा कम्पनी को समस्त पूर्वी देशों में व्यापार का एकमेव स्वामित्व सौंपा गया। तथा कम्पनी की समस्त शक्तियां 24 सदस्यीय परिषद में निहित थी।

⇒ 1726 के राजलेख द्वारा कलकत्ता, बम्बई तथा मद्रास प्रेसीडेन्सी के गवर्नरों को विधि बनाने की शक्ति सौंपी गयी।

⇒ 1726 के चार्टर के द्वारा भारत स्थिति कम्पनी को नियम, उपनियम तथा अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान की गयी।

1773 का रेग्यूलेटिंग ऐक्ट (1773 Regulating Act)

⇒ ब्रिटिश सरकार (British Government) ने कम्पनी में व्याप्त भ्रष्टाचार और कुप्रशासन को दूर करने के लिए 1773 ई. का रेग्यूलेटिंग एक्ट (Regulating Act) पारित किया।

⇒ इस ऐक्ट के तहत मद्रास एवं बम्बई प्रेसीडेन्सियों को कलकत्ता प्रसीडेन्सियों के अधीन कर दिया। जिसका प्रमुख एक गवर्नर जनरल (Governor General) होता था। गवर्नर जनरल (Governor General) का नियंत्रण अपूर्व था।

⇒ गवर्नर जनरल (Governor General) की परिषद में चार सदस्य थे। सम्पूर्ण कलकत्ता प्रेसीडेन्सियों का प्रशासन तथा सैनिक शक्ति इसी सरकार में निहित होती थी।

⇒ रेग्यूलेटिंग एक्ट (Regulating Act) के द्वारा कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गई। इसमें एक मुख्य न्यायधीश तथा तीन अपर न्यायधीश होते थे।

⇒ रेग्यूलेटिंग एक्ट (Regulating Act) के द्वारा पहली बार ब्रिटिश मण्डल को भारतीय मामलों में नियंत्रण को अधिकार दिया गया जो कि अपूर्ण है।

⇒ रेग्यूलेटिंग एक्ट (Regulating Act) ने एक ईमानदार शासन का आधारभूत सिद्धान्त निश्चित किया।

⇒ सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के विरुद्ध अपील प्रिवी कौंसिल में की जा सकती थी।

⇒ गवर्नर जनरल (Governor General) की परिषद को फोर्ट विलियम बस्ती के प्रशासन को सुव्यवस्थित करने के लिए भी शक्ति प्राप्त थी।

⇒ ऐक्ट ऑफ सेटेलमेंट, 1781 रेग्यूलेंटिग एक्ट की त्रुटियों को समाप्त करने के लिए लाया गया था।

⇒ इस ऐक्ट के तहत कलकत्ता के गवर्नर को बंगाल, बिहार और उङीसा के लिए भी विधि बनाने का अधिकार दिया गया।

पिट्स इंडिया एक्ट (Pitts india act)-1784

⇒ ब्रिटिश पार्लियामेन्ट ने कम्पनी के ऊपर अपने प्रभाव को और मजबूत करने के उद्देश्य से 1784 में पिट्स इंडिया एक्ट (Pitts india act) पारित किया।

⇒ पिट्स इंडिया एक्ट (Pitts india act) ने कम्पनी के व्यापारिक एवं राजनीतिक कार्य-कलापों को एक दूसरे से अलग कर दिया।

⇒ पिट्स इंडिया एक्ट (Pitts india act) के विवाद को ही लेकर लार्ड नार्थ तथा फाक्स की मिली जुली सरकार को त्याग पत्र देना पङा।

⇒ यह पहला और अन्तिम अवसर था जब किसी भारतीय मामले पर ब्रिटिश सरकार (British Government) गिर गयी हो।

⇒ कम्पनी के वाणिज्य सम्बन्धी विषयों को छोङकर सभी सैनिक, असैनिक एवं राजस्व सम्बन्धी मामलों को एक नियंत्रण बोर्ड के अधीन कर दिया था।

⇒ इस नियंत्रण बोर्ड में एक चांसलर ऑफ एक्सचेकर एक राज्य सचिव तथा उनके द्वारा नियुक्त चार प्रीवी कौंसिल के सदस्य होते थे।

⇒ तीन डाइरेक्टरों की एक समिति द्वारा बोर्ड के सभी मुख्य आदेश भारत को भेजे जाते थे।

⇒ इसी अधिनियम (Act) के अनुसार बम्बई तथा मद्रास प्रेसीडेन्सियां भी गवर्नर-जनरल तथा उसकी परिषद के अधीन कर दी गयी।

⇒ भारत में प्रशासन गवर्नर जनरल (Governor General) तथा तीन सदस्यीय परिषद में केन्द्रित हो गया।

⇒ इस नियम द्वारा द्वैध शासन की शुरूआत हुई है जो 1858 तक विद्यमान रही। एक कम्पनी के द्वारा तथा दूसरा संसदीय बोर्ड के द्वारा।

⇒ इस अधिनियम (Act) के तहत इंग्लैण्ड में सरकार का विभाग बनाया गया जिसे नियंत्रण बोर्ड कहते थे। जिसका मुख्य कार्य डाइरेक्टर्स की नीति को नियंत्रित करना था।

⇒ इस अधिनियम (Act) से कार्यकारी पार्षदों की सख्ंया तीन रह गयी जिनमें से मुख्य सेनापति एक था।

⇒ बर्क ने इस विषय पर टिप्पणी करते हुए लिखा था कि ’’ अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक ऐसा अच्छा तथा दक्ष उपाय है जैसा कि कोई मनुष्य बना सकता है।

1786-का अधिनियम (Act)

⇒ पिट ने 1786 में यह अधिनियम (Act) पारित करवाया जिसका मुख्य उद्देश्य कार्नवालिका को भारत के गवर्नर जनरल (Governor General) के पद के लिए तैयार करना था।

⇒ इस अधिनियम (Act) के तहत मुख्य सेनापति की शक्तियां भी गवर्नर जनरल (Governor General) में निहित कर दी गयी।

⇒ गवर्नर जनरल (Governor General) विशेष अवस्था में परिषद कें निर्णयों को रद्द कर सकता था तथा उसे लागू कर सकता था।

1793 का चार्टर एक्ट (Charter act of 1793)

⇒ 1793 ई. में एक चार्टर एवं पारित किया गया जिसके द्वारा कम्पनी के व्यापारिक अधिकारों को 20 वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया।

⇒ गवर्नर-जनरल का बम्बई तथा मद्रास प्रेसीडेन्सियों पर अधिकार स्पष्ट कर दिये गये।

⇒ यदि गवर्नर-जनरल बंगाल के बाहर जाता था तो उसे अपनी परिषद के असैनिक सदस्य में से किसी एक को उपप्रधान नियुक्त करना होता था।

⇒ मुख्य सेनापति को गवर्नर-जनरल की परिषद् का स्वतः ही सदस्य होने का अधिकार समाप्त हो गया। इन सभी सदस्यों का वेतन भारतीय कोष से मिलता था, जो 1919 तक जारी रहा।

1813 का चार्टर एक्ट (Charter Act of 1813)

⇒ समकालीन यदभाव्यम् के सिद्धान्त तथा अंगे्रजों के यूरोपीय व्यापार बन्द होने के कारण से कम्पनी के व्यापारिक अधिकार को समाप्त करने के लिए 1813 का चार्टर एक्ट लाया गया।

⇒ इसलिए 1813 के चार्टर एक्ट के द्वारा कम्पनी के भारतीय व्यापार के एकाधिकार को समाप्त कर दिया गया।

⇒ यद्यपि उसके चीन तथा चाय के व्यापार का एकाधिकार चलता रहा।

⇒ प्रथम बार अंग्रजों की भारत पर सवैधानिक (Constitutional) स्थिति स्पष्ट की गयी थी।

⇒ 1813 के चार्टर के द्वारा नियंत्रण बोर्ड की अधीक्षण तथा नियंत्रण शक्ति को न केवल परिभाषित किया गया अपितु उसका विस्तार भी किया गया।

⇒ इस एक्ट के तहत एक लाख रूपया प्रतिवर्ष विद्वान भारतीयों के प्रोत्साहन तथा साहित्य के सुधार तथा पुनुरूत्थान के लिए रखा गया।

⇒ यह भारत सम्बन्धी अंग्रेजी घोषणा में अपना एक अलग महत्व रखता है।

1833 का चार्टर एक्ट (Charter Act of 1833)

⇒ 1833 के चार्टर एक्ट पर, इंग्लैण्ड की आद्यौगिक क्रान्ति, उदारवादी नीतियों का क्रियान्वयन तथा लेसेज फेयर के सिद्धान्त की छाप थी।

⇒ नियंत्रण बोर्ड कें सचिव मेकाले तथा बेन्थम के शिष्य जेम्स मिल का प्रभाव 1833 के चार्टर एक्ट पर स्पष्ट रूप से प्रतिध्वनित होता है।

⇒ इस एक्ट ने कम्पनी को अगले 20 वर्षो के लिए नया जीवन दिया। तथा उसे एक ट्रस्टी के रूप में प्रतिष्ठित किया।

⇒ कम्पनी के वाणिज्यिक अधिकार समाप्त कर दिये गये, तथा उसे भविष्य में केवल राजनैतिक कार्य ही करने थे।

⇒ इस अधिनियम (Act) ने कम्पनी के डायरेक्टरों के संरक्षण को कम किया।

⇒ इस अधिनियम (Act) के द्वारा भारतीय प्रशासन का केन्द्रीयकरण किया गया। बंगाल का गवर्नर अब भारत का गवर्नर जनरल (Governor General) बना दिया।

⇒ सपरिषद गवर्नर जनरल (Governor General) को कम्पनी के सैनिक तथा असैनिक कार्य का नियंत्रण निरीक्षण तथा निर्देशन सौंपा गया।

⇒ इस अधिनियम (Act) द्वारा भारत में दासता को अवैध घोषित किया गया।

⇒ सभी कर सपरिषद गवर्नर-जनरल की आज्ञा से ही लगाये जा सकते थे। इस प्रकार प्रशासन तथा वित्त की सारी शक्ति गवर्नर जनरल (Governor General) और उसकी परिषद में केन्द्रित हो गयी।

⇒ इस अधिनियम (Act) के द्वारा कानून बनाने के लिए गवर्नर-जनरल की परिषद में एक कानूनी सदस्य चैथे सदस्य के रूप में सम्मिलित किया गया।

⇒ सर्वप्रथम मेकाले को विधि सदस्य के रूप में गवर्नर-जनरल की परिषद में सम्मिलित किया गया।

⇒ केवल सपरिषद गवर्नर-जनरल को ही भारत के लिए कानून बनाने के अधिकार प्राप्त थे।

⇒ भारतीय कानूनों को संचित लिपिबद्ध तथा सुधारने के उद्देश्य के एक विधि आयोग का गठन किया गया।

⇒ इस अधिनियम (Act) के द्वारा कम्पनी के चीन से व्यापार तथा चाय सम्बन्धी व्यापार के एकाधिकार को समाप्त कर दिया गया।

⇒ गवर्नर-जनरल को ही विधि आयुक्त को नियुक्त करने का अधिकार प्रदान किया गया।

⇒ इस अधिनियम (Act) के द्वारा नियुक्तियों के लिए योग्यता सम्बन्धी मापदंड को अपना कर, भेदभाव समाप्त किया गया।

⇒ इस अधिनियम (Act) द्वारा बंगाल का गवर्नर-जनरल अब समूचे भारत का गवर्नर-जनरल बन गया।

1853-का चार्टर एक्ट (Charter Act of 1853)

⇒ इस चार्टर ने कार्यपालिका तथा विधायी शक्तियों को पृथक करने का एक निश्चित कदम उठाया। भारत वर्ष के लिए पृथक विधान-परिषद की स्थापना की गयी।

⇒ विधान परिषद में 12 सदस्य होते थे। कमान्डर-इन-चीफ, गवर्नर-जनरल, गवर्नर-जनरल के चार सदस्य और 6 सभासद विधान-परिषद के सदस्य होते थे।

⇒ अन्य 6 सदस्यों में बंगाल के मुख्य न्यायधीश, कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट का एक न्यायधीश और बंगाल-मद्रास, बम्बई और आगरा चार प्रान्तों के प्रतिनिधि शामिल थे।

⇒ इस प्रकार भारतीय विधान परिषद में सर्वप्रथम क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का सिद्धान्त पारित किया गया।

⇒ विधान परिषद द्वारा पारित विधेयकों को गर्वनर-जनरल वीटो कर सकता था।

⇒ विधि सदस्य को गवर्नर-जनरल की कर्यकारिणी का पूर्ण सदस्य बना दिया गया।

⇒ परिषद में वाद-विवाद का प्रारूप मौखिक था। परिषद का कार्य गोपनीय नहीं सार्वजनिक प्रकृति का था।

⇒ 1853 के अधिनियम (Act) ने ही सर्वप्रथम सम्पूर्ण भारत के लिए एक-विधान मण्डल की स्थापना की।

⇒ इस अधिनियम (Act) ने कम्पनी डायरेक्टरों से नियुक्ति सम्बन्धी अधिकार वापस ले लिया जिससे डायरेक्टरों का संरक्षण भी समाप्त हो गया।

1858-का अधिनियम (Act)

⇒ कम्पनी की दोहरी शासन-व्यवस्था को समाप्त करने के लिए 1858 में ब्रिटिश सरकार (British Government) ने एक अधिनियम (Act) पारित किया।

⇒ इस अधिनियम (Act) को-’’1858 एक्ट फाँर दी बेटर गवर्नमेंट आफ इंडिया’’ की संज्ञा से नामित किया गया।

⇒ 1858 के अधिनियम (Act) ने भारत के शासन को कम्पनी के हाथों से निकाल कर सम्राट को सौंप दिया।

⇒ भारत का प्रशासन अब साम्राज्ञी द्वारा नियुक्त 15 सदस्यीय एक परिषद को सौंप दिया गया, जिसका अध्यक्ष मुख्य राज्य सचिव या भारत-राज्य-सचिव (state Secretary) के नाम से विभूषित किया गया।

⇒ राज्य सचिव को उस समय तक डायरेक्टर्स के बोर्ड तथा नियंत्रण बोर्ड, दोनों बोर्डो की सयुक्त शक्तियां मिल गयी।

⇒ इस प्रकार 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट (Pitts india act) द्वारा लागू द्वैध शासन प्रणाली समाप्त कर दी गयी।

⇒ राज्य सचिव की 15 सदस्यीय परिषद में से 8 की नियुक्ति क्राउन के द्वारा तथा 7 की डायरेक्टर्स के बोर्ड द्वारा होनी थी।

⇒ अधिनियम (Act) में एक महत्वपूर्ण व्यवस्था यह थी कि इन सदस्यों में से कम से कम आधे ऐसे लोग हो जो भारत में 10 वर्ष तक सेवा कर चुके हों।

⇒ परिषद की भूमिका केवल परामर्शदाता की थी और प्रायः बहुत से मामलों में राज्यसचिव का निर्णय ही अन्तिम हो सकता था।

⇒ भारत के गवर्नर-जनरल को अब वाइसराय की उपाधि मिली, जो क्राउन का सीधा प्रतिनिधि था।

⇒ राज्य-सचिव (state Secretary) को भारत से प्राप्त मालगुजारी का लेखा प्रतिवर्ष संसद के सामने प्रस्तुत करना पङता था। उसे भारत के नैतिक एवं भौतिक विकास की रिपोर्ट भी संसद को देनी पङती थी।

⇒ भारत के राज्य-सचिव (state Secretary) को एक-विकास निगम घोषित किया गया।

⇒ राज्य-सचिव (state Secretary) ब्रिटिश मन्त्रिमण्डल का सदस्य होता था इसलिए वह ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी था।

⇒ कन्वेन्टेड सिविल सेवा में नियुक्तियां खुली प्रतियोगिता द्वारा की जाने लगी, जिसके लिए राज्य सचिव ने सिविल कमिश्नर की सहायता से नियमों की उत्पत्ति की।

1861- का भारत परिषद अधिनियम (1861-India Council Act)

⇒ विधि-निर्माण की त्रुटिपूर्ण प्रणाली वाइसराय की निषेधात्मक शक्ति तथा विधान परिषद में भारतीयों का न के बराबर प्रतिनिधत्व आदि कारणों ने 1861 के भारत परिषद अधिनियम (Act) की पृष्ठभूमि तैयार की।

⇒ ब्रिटिश सरकार (British Government) ने उपरोक्त कमियों को दूर करने के लिए 1861 का भारत परिषद अधिनियम (Act) पारित किया।

⇒ सन् 1861 के अधिनियम (Act) ने भारत में प्रतिनिधि संस्थाआंे को जन्म दिया।

⇒ वाइसराय की परिषद में एक पांचवा सदस्य शामिल किया गया जो कि एक विधिवेत्ता का पद था।

⇒ वाइसराय की परिषद को कानून बनाने की शक्ति प्रदान की गई, जिसके तहत लार्ड कैनिंग ने विभागीय प्रणाली की शुरूआत की।

⇒ लार्ड कैनिंग ने भिन्न-भिन्न सदस्यों को अलग-अलग विभाग सौंप कर एक प्रकार से मन्त्रिमण्डलीय व्यवस्था की नींव डाली।

⇒ इस व्यवस्था के अनुसार प्रशासन का प्रत्येक विभाग एक व्यक्ति के अधीन होता था।

⇒ वाइसराय की विधान परिषद के सदस्यों की संख्या बढ़ा दी गयी। न्यूनतम संख्या 6 और अधिकतम संख्या 12 निर्धारित की गयी।

⇒ इनको वाइसराय मनोनीत करेगा तथा इनकी अवधि 2 वर्ष तक के लिए रखी गयी।

⇒ इन नामांकित सदस्यों में से आधे सदस्य गैर सरकारी सदस्य होते थे। इनका कार्यकाल दो वर्ष का होता था।

⇒ विधान परिषद की शक्ति अत्यन्त सीमित थी। सदस्यों को प्रशासन अथवा वित्त सम्बन्धी प्रश्नों को पूछने का कोई अधिकार नहीं था।

⇒ वाइसराय को संकटकालीन समय में विधान परिषद की सलाह के बिना ही अध्यादेश जारी करने की अनुमति प्राप्त थी।

⇒ इस अध्यादेशों की क्रियाशीलता को केवल 6 मास के लिए निर्धारित किया गया।

⇒ वाइसराय को विधान परिषद द्वारा पारित विधियों को वीटो करने की शक्ति प्राप्त थी। ब्रिटिश संसद किसी भी विधि को अस्वीकृत कर सकती थी।

⇒ इस अधिनियम (Act) के अनुसार बम्बई या मद्रास प्रांतों की परिषदों को अपने लिए कानून तथा उनमें संशोधन का अधिकार दे दिया गया।

⇒ तथापि इनकी वैधता वाइसराय की अनुमति पर ही निर्भर थी।

⇒ इस अधिनियम (Act) के द्वारा वाइसराय को नये प्रान्तों की स्थापना तथा उनकी सीमाओं में परिवर्तन का अधिकार भी प्राप्त हो गया।

1892-का भारत परिषद अधिनियम (1892-India Council Act)

⇒ 1857 की राज्य क्रान्ति के फलस्वरूप भारतीयों में पनपी राष्ट्रीयता, 1885 में कांग्रेस की स्थापना तथा इलवर्ट बिल विवाद आदि घटनाओं ने 1992 के भारत परिषद अधिनियम (Act) पारित करने के लिए अंग्रेजों को बाध्य किया।

⇒ इस अधिनियम (Act) द्वारा केन्द्रीय तथा प्रान्तीय विधान परिषदों की सदस्य संख्या में वृद्धि की गयी।

⇒ केन्द्रीय विधानपरिषद में न्यूनतम 10 तथा अधिकतम सदस्य संख्या 16 निर्धारित की गयी।

⇒ वाइसराय को सदस्यों के नामांकन का अधिकार सुरक्षित रखा गया।

⇒ परिषद के भारतीय सदस्यों को वार्षिक बजट पर बहस करने तथा सरकार से प्रश्न पूछने का अधिकार भी दिया गया।

⇒ प्रान्तीय विधानमण्डलों को बम्बई तथा मद्रास में इस अधिनियम (Act) द्वारा न्यूनतम 8 तथा अधिकतम 20 अतिरिक्त सदस्यों द्वारा बढ़ा दिया गया।

⇒ इन सदस्यों को सार्वजनिक हित के मामलों में 6 दिन की सूचना देकर प्रश्न पूछने का भी अधिकार दिया गया। यह केन्द्रीय तथा प्रान्तीय दोनों विधान मण्डलों के लिए यह व्यवस्था थी।

⇒ परन्तु यदि प्रशासन आवश्यक समझे तो बिना कारण बताये प्रश्नों का उत्तर देने से मना कर सकती थी।

⇒ इस अधिनियम (Act) का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान चुनाव पद्धति की शुरूआत करनी थी।

⇒ केन्द्रीय विधानमण्डल मे अधिकारियों के अतिरिक्त 5 गैरसरकारी सदस्य होते थे, जिन्हे चारों प्रान्तों के विधान मण्डलों के गैर सरकारी सदस्य तथा कलकत्ता के वाणिज्य मण्डल के सदस्य निर्वाचित करते थे।

⇒ तथा अन्य 5 गैर सरकारी सदस्यों को वाइसराय मनोनीत करता था।

⇒ भारतीय विधान मण्डल के सदस्यों को नगर पालिकायें जिला बोर्ड, विश्वविद्यालय तथा वाणिज्य मण्डल निर्वाचित करते थे।

⇒ निर्वाचन की पद्धति पूर्णयता अप्रत्यक्ष थी तथा निर्वाचित सदस्यों को ’’मनोनीत’’ की ही संज्ञा दी जाती थी।

⇒ इस अधिनियम (Act) में चुनाव प्रणाली को तो स्वीकार किया गया था, परन्तु स्पष्ट ढंग से नहीं। विधानमण्डलों की शक्तियां बहुत सीमित थी, सदस्यों को अनुपूरक प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं था।

⇒ चुनाव की विधियां संतोषजनक नहीं थी। सिद्धान्त रूप में हम केवल यही कह सकते है कि यह अधिनियम (Act) अखिल भारतीय कांग्रेस की मांगों से काफी कम था फिर भी एक सकारात्मक प्रयास था।

1909 -का भारतीय परिषद
एक्ट अथवा मिन्टो-मार्ले सुधार (1909 – Correction of Indian Council or Minto-Marley)

⇒ नवम्बर, 1906 में लार्ड कर्जन के स्थान पर लार्ड मिन्टो को भारत का वायसराय नियुक्त किया गया तथा जाॅन माॅरले को भारत सचिव नियुक्त किया गया।

⇒ माॅरले उदारवादी विचारों के व्यक्ति थे तथा भारतीय प्रशासन में सुधारों के समर्थक थे। तथा भारत के वायसराय लार्ड मिन्टो, भारत सेके्रटरी माॅरले के विचारों से सहमत थे।

⇒ इसलिए इनके द्वारा किये गये सुधारों को मार्ले मिन्टो के सुधार के नाम से जाना जाता है।

⇒ 1909 के अधिनियम (Act) द्वारा भारतीयों को विधि-निर्माण तथा प्रशासन दोनों में प्रतिनिधित्व प्रदान किया।

⇒ केन्द्रीय विधान सभा में सदस्यों की संख्या 60 कर दी गयी। अब विधान मण्डल में 69 सदस्य थे जिनमें से 37 शासकीय सदस्य तथा 32 गैर शासकीय वर्ग के थे।

⇒ 32 गैर सरकारी सदस्यों में से 27 सदस्य निर्वाचित होते थे और पांच नाम जद। निर्णायक मण्डल को तीन भागों में बाँटा गया था- सामान्य निर्वाचक वर्ग, वर्गीय निर्वाचक वर्ग और विशिष्ट निर्वाचक वर्ग।

⇒ इस अधिनियम (Act) ने केन्द्रीय तथा प्रान्तीय विधायनी शक्ति को बढ़ा दिया। परिषद के सदस्यों को बजट की विवेचना करने तथा उस पर प्रश्न करने का अधिकार दिया गया।

⇒ बंगाल मद्रास तथा बम्बई की कार्यकारिणी की संख्या बढ़ाकर 4 कर दी गई। उप राज्यपालों को भी अपनी कार्यकारिणी नियुक्त करने की अनुमति नहीं थी।

⇒ इस अधिनियम (Act) के द्वारा मुसलमानों के लिए पृथक मताधिकार तथा पृथक निर्वाचन क्षेत्रों की स्थापना की गयी।

⇒ इस अधिनियम (Act) के बारे में के. एम. मुन्शी के अनुसार- ’’इन्होंने उभरते हुए प्रजातन्त्र को मार डाला है।’’

⇒ लार्ड मिन्टो ने पृथक निर्वाचक मण्डल स्थापित करके लार्ड माॅरले को लिखा था- ’’ हम नाग के दांत बो रहे हैं
और इसका फल भीषण होगा।’’

⇒ इस अधिनियम (Act) के द्वारा स्थापित चुनाव प्रणाली बहुत ही अस्पष्ट तथा जनप्रतिनिधित्व के विरुद्ध थीं।

⇒ इस अधिनियम (Act) में मताधिकार के सम्बन्ध में हिन्दुओं के साथ अन्याय किया गया।

⇒ प्रान्तों में गैर-सरकारी सदस्यों का बहुमत दिखावा मात्र था। क्योंकि सरकारी और मनोनीत गैर सरकारी सदस्य मिलकर बहुमत में हो जाते थे।

⇒ इस अधिनियम (Act) के बारे मजूमदार टिप्पणी करते हुए कहते हैं- ’’1909 के सुधार केवल चन्द्रमा की चांदनी के समान है।’’

⇒ रैम्जे मैकडोनाल्ड के शब्दों में- ’’ये सुधार प्रजातन्त्रवाद और नौकरशाही के मध्य एक अधूरा और अल्प कालीन समझौता हैं।

1919 का भारत सरकार अधिनियम(माॅण्टेग्यु – फोर्ड सुधार) (Government of India Act of 1919 (Montagu-Ford Correction)

⇒ 1919 के अधिनियम (Act) का तात्कालीन कारण 1916 का होमरूल आन्दोलन तथा मेसोपोटेमिया कमीशन की रिपार्ट थी। जिसमें भारतीय सरकार की अकुशलता का स्पष्ट आरोप था।

⇒ 1919 के अधिनियम (Act) का यह भी प्रयत्न था कि किस प्रकार भारत के एक प्रभावशाली वर्ग को कम से कम दस वर्ष के लिए ब्रिटिश राज का समर्थक बना लिया जाय।

⇒ इस अधिनियम (Act) में पहलीबार ’’उत्तरदायी-शासन’’ शब्दों का स्पष्ट प्रयोग किया गया था। जिसने भारत में तनावपूर्ण वातावरण को कुछ समय के लिए शान्त बना दिया।

⇒ प्रान्तों में आंशिक उत्तरदायी शासन तथा द्वैध शासन की स्थापना की गयी।

⇒ 1793 ई. से भारत राज्य सचिव को भारतीय राजस्व से वेतन मिलता था। इस अधिनियम (Act) के द्वारा अब वह अंग्रती राजा से मिलना तय किया गया।

⇒ केन्द्रीय परिषद में भारतीयों को अधिक प्रभावशाली भूमिका दी गयी। वाइसराय के 8 सदस्यों में से 3 भारतीय नियुक्त किये गये और उन्हे-विधि, शिक्षा, उद्योग आदि विभाग सौंपे गये।

⇒ इस नये अधिनियम (Act) के अनुसार सभी विषयों को केन्द्र तथा प्रान्तों में बांट दिया गया।

⇒ केन्द्रीय सूची में वर्णित विषयों पर सपरिषद गवर्नर जनरल (Governor General) का अधिकार था।जैसे-विदेशी मामले, रक्षा, डाक-तार, सार्वजनिक ऋण आदि।

⇒ प्रान्तीय सूची (Provincial list) के विषय थे- स्थानीय स्वशासन, शिक्षा चिकित्सा, भूमिकर, जल संभरण, अकाल सहायता, कृषि व्यवस्था आदि।

⇒ सभी अवशेष शक्तियां केन्द्रीय सरकार के पास थी।

⇒ इस अधिनियम (Act) के तहत केेन्द्र में द्विसदनीय व्यवस्था स्थापित की गयी। एक सदन राज्य परिषद तथा दूसरे को केन्द्रीय विधान सभा कहा गया।

⇒ राज्य परिषद में सदस्यों की संख्या 60 निश्चित की गयी। जिसमें 34 निर्वाचित तथा शेष 26 गवर्नर जनरल (Governor General) द्वारा मनोनीत होते थे।

⇒ राज्य-परिषद का प्रतिवर्ष नवीनीकरण होता था परन्तु ये सदस्य 5 वर्ष के लिए बनते थे।

⇒ स्त्रियों को सदस्यता के उपयुक्त नहीं समझा गया। वाइसराय को इस सदन को बुलाने, स्थापित तथा भंग करने का अधिकार था।

⇒ निम्न सदन को केन्द्रीय विधान सभा का नाम दिया गया। इसमें सदस्यों की संख्या 145 निर्धारित की गयी। 104 निर्वाचित तथा 41 सदस्य मनोनीत होते थे।

⇒ मनोनीतों में 26 शासकीय तथा 15 अशासकीय थे।

⇒ सभा कार्यकाल त्रिवर्षीय था, वायसराय इसके कार्यकाल को बढ़ा भी सकता था।

⇒ द्विसदनीय केन्द्रीय विधानमण्डल को पर्याप्त शक्तियां दी गयी थी, यह समस्त भारत के लिए कानून बना सकती थी।

⇒ सदस्यों को प्रस्ताव तथा स्थगन प्रस्ताव लाने की अनुमति थी प्रश्न तथा पूरक प्रश्नों पर कोई रोक नहीं थी। सदस्यों को बोलने का अधिकार तथा स्वतन्त्रता थी।

⇒ गवर्नर-जनरल क्राउन की अनुमति से कोई भी बिल पारित कर सकता था। वह अध्यादेश जारी कर सकता था जिसकी वैधता 6 माह की होती थीं।

⇒ इस विधेयक के तहत प्रान्तों में द्वैध शासन प्रणाली लागू की गयी। प्रान्तीय विषयों को दो भागांे में बांटा गया था- आरक्षित तथा हस्तान्तरित विषय।

⇒ आरक्षित विषयों पर प्रशासन गवर्नर अपने उन पार्षदों की सहायता से करता था जिन्हे वह मनोनीत करता था। तथा हस्तान्तरित विषयांे का प्रशासन निर्वाचित सदस्यों के द्वारा करता था।

⇒ प्रान्तीय परिषदों में कम से कम 70 प्रतिशत सदस्य निर्वाचित तथा शेष मनोनीत होते थे। शासकीय सदस्यों की संख्या 20 प्रतिशत से अधिक नहीं होती थी।

⇒ 1919 के अधिनियम (Act) के द्वारा पंजाब में सिखों को कुछ प्रान्तों में यूरोपियनों, एग्लो इंडियनों को तथा भारतीय ईसाइयों को पृथक प्रतिनिधित्व दिया गया।

⇒ इस अधिनियम (Act) द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली लागू की गयी और मताधिकार 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया।

भारत शासन अधिनियम -1935 (Government of India Act-1935)

⇒ 1935 के अधिनियम (Act) द्वारा सर्वप्रथम भारत में संघात्मक सरकार की स्थापना की गयी।

⇒ इस संघ को ब्रिटिश भारतीय प्रान्त कुछ भारतीय रियासतें जो संघ में शामिल होना चाहती थी, मिलाकर बनाया गया था।

⇒ 1935 के अधिनियम (Act) द्वारा प्रान्तों में द्वैध शासन समाप्त करके केन्द्र में द्वैध शासन लागू किया गया।

⇒ केन्द्रीय सरकार की कार्यकारिणी शक्ति गवर्नर जनरल (Governor General) में निहित थी।

⇒ संघ में प्रशासन के विषय दो भागों में विभक्त थे-

(1) हस्तान्तरित

(2) रक्षित

⇒ रक्षित विषयों में प्रतिरक्षा, विदेशी मामले, धार्मिक विषय और जनजातीय क्षेत्र सम्मिलित थे।

⇒ बाकी सारे विषय हस्तान्तरित ग्रुप में आते थे।

⇒ सन् 1935 के अधिनियम (Act) द्वारा प्रान्तो को स्वायत्तता प्रदान की गयी।

⇒ प्रान्तीय विषयों पर विधि बनाने का अधिकार प्रान्तों को दिया गया था। केन्द्रीय सरकार का कार्य एक प्रकार से संघात्मक होता था।

⇒ प्रान्त की कार्यपालिका शक्ति गवर्नर में निहित थी तथा वह इसका प्रयोग ब्रिटिश सरकार (British Government) की तरफ से करता था।

⇒ गवर्नर जनरल (Governor General) के सभी कार्य, मन्त्रिपरिषद की सलाह से होते थे, जिनके लिए वह विधान सभा के प्रति उत्तरदायी थी।

⇒ केन्द्रीय विधान मण्डल में दो सदन थे- विधान सभा तथा राज्य परिषद।

⇒ विधान सभा में 375 सदस्य थे जिसमें 250 सदस्य ब्रिटिश भारतीय प्रान्तों से तथा 125 सदस्य भारतीय रियासतों से होते थे।

⇒ विधान सभा का कार्यकाल 5 वर्ष का होता था गवर्नर जनरल (Governor General) केा विघटित करने की शक्ति प्राप्त थी।

⇒ 1935 के अधिनियम (Act) द्वारा बर्मा को ब्रिटिश भारत से पृथक कर दिया गया, दो नये प्रांत सिंध और उङीसा का निर्माण हुआ।

⇒ राज्य परिषद में कुल 260 सदस्य होते थे, जिनमें से 104 ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधि, 104 भारतीय रियासतों के प्रतिनिधि होते थे।

⇒ राज्य परिषद एक स्थायी संस्था थी, जिसके एक तिहाई सदस्य प्रति दूसरे वर्ष अवकाश ग्रहण करते थें।

⇒ केन्द्रीय विधान मण्डल की शक्तियां अत्यन्त सीमित थी। गवर्नर-जनरल अपने विवेकानुसार एक साथ दोनों सदनों को आहूत कर सकता था, सत्रावसान कर सकता था तथा उसका विघटन भी कर सकता था।

⇒ उसे विधेयकों पर वोटों की शक्ति प्राप्त थी।

⇒ धन विधेयक पर विधानसभा की शक्ति अत्यान्तिक थी।

⇒ किसी विधेयक पर गतिरोध की दशा में गवर्नर जनरल (Governor General) संयुक्त अधिवेशन बुला सकता था।

⇒ सन् 1935 के अधिनियम (Act) के द्वारा कुछ प्रान्तों में द्विसदनात्मक व्यवस्था की गयी थी।

⇒ उच्च सदन विधान परिषद तथा निम्न सदन विधान-सभा कहलाता था।

⇒ प्रान्तों की कार्यपालिका का गठन गवर्नर तथा मन्त्रिपरिषद के द्वारा होता था।

⇒ गवर्नर को तीन प्रकार की शक्तियां प्राप्त थी-

(1) विवेकीय शक्तियां

(2) विशिष्ट उत्तरदायित्व की शक्तियां

(3) मन्त्रिमण्डल की सलाह से प्रयुक्त शक्तियां

⇒ प्रान्तीय सूची (Provincial list) में समाविष्ट सभी विषयों पर प्रान्तीय विधान मण्डलों को विधि बनाने की आत्यान्तिक शक्ति थी।

⇒ वे समवर्ती विषयों पर भी विधि बना सकते थे।

⇒ वित्तीय विधेयक, गवर्नर की पूर्व अनुमति से ही पेश किये जाते थे।

⇒ कोई भी विधेयक, बिना गवर्नर की अनुमति के कानून नहीं बना सकता था।

⇒ किसी ऐसे विधेयक पर, जिसको गवर्नर की अनुमति प्राप्त थी, सम्राट उसको अस्वीकृत कर सकता था।

⇒ अपनी विवेकीय शक्ति एवं व्यक्तिगत निर्णय की शक्तियों के परिणाम स्वरूप गवर्नर एक तानाशाह का कार्य करता था।

⇒ सन् 1935 के अधिनियम (Act) के द्वारा एक संघीय न्यायालय (Federal court) की स्थापना की भी व्यवस्था थी।

⇒ फेडरल न्यायालय के विरुद्ध अपील प्रिवी कौंसिल में की जा सकती थी।

⇒ संघीय न्यायालय (Federal court) को तीन प्रकार की अधिकारिता प्राप्त थी – प्रारम्भिक अपीलीय तथा परामर्श दात्री।

⇒ प्रारम्भिक अधिकारिता के अन्तर्गत संघीय न्यायालय (Federal court) संविधान के उपबन्धों का निर्वाचन करता था या उससे सम्बन्धित विवादों का।

⇒ अपीलीय अधिकारिता के अन्तर्गत संघ न्यायालय भारत स्थित सभी उच्च न्यायालयों के विनिश्चयों से अपीलों की सुनवायी करता था।
संघीय न्यायालय (Federal court) को सिविल और दांडिक मामलों में अपीलीय अधिकारिता नहीं दी गयी थी।

⇒ परामर्श दात्री अधिकारिता के अन्तर्गत गवर्नर जनरल (Governor General) को विधि एवं तथ्य के किसी विषय पर सलाह देने का अधिकार प्राप्त था।

⇒ नेहरू ने 1965 के अधिनियम (Act) के बारे में कहा कि ’यह अनेक ब्रेको वाला इंजन रहित गाङी के समान है।’ मुहम्मद अली जिन्ना (Muhammad Ali Jinnah) ने इसे पूर्णतया सङा हुआ, मूलरूप से बुरा और बिल्कुल अस्वीकृत बताया।

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मुगलकाल के महत्वपूर्ण 200 प्रश्न

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