बलबन || दिल्ली सल्तनत || इतिहास

बलबन का शासन

बलबन(Balban)

बलबन ने बीस वर्ष तक वजीर की हैसियत से तथा 20 वर्ष तक सुल्तान के रूप में शासन किया बलबन दिल्ली सल्तनत का एक ऐसा व्यक्ति था जो सुल्तान ने होते हुए भी सुल्तान के छत्र का उपयोग करता था वह पहला शासक था जिसने सुल्तान के पद और अधिकारों के बारे में विस्तृत रूप से विचार प्रकट किए उसने सुल्तान की प्रतिष्ठा को स्थापित करने के लिए रक्त एवं लौह की नीति अपनाई।

बलबन के राजत्व सिद्धांत की दो मुख्य विशेषताएं थी

1.सुल्तान का पद ईश्वर के द्वारा प्रदान किया हुआ होता है ।

2.सुल्तान का निरंकुश होना आवश्यक है।

उसके अनुसार सुल्तान पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि है और उसका स्थान केवल पैगंबर के पश्चात है बलबन अपने को फिरदोसी के शाहनामा में वर्णित अफरासियाब वंशज  तथा शासन को इरानी आदर्श के रूप में सुव्यवस्थित किया ।

बलबन ने उन सभी जागीरो की जांच कराई जो विभिन्न विधियों को सैनिक सेवा के बदले शासकों द्वारा दी जाती थी जागीरा से आय एकत्रित करने का अधिकार सरकारी कर्मचारियों को दिया गया और जागीरदारों को नगद धन देने के आदेश दिए गए किंतु सैनिकों को वेतन के स्थान पर पहले की बांधी भूमि प्राप्त होती रही।

उसने ऐसे सैनिकों को जो सेवा के योग्य नहीं रह गए थे पेंशन देकर सेवा मुक्त किया उसके समय में वजीर के पद का महत्व घट गया और नाइब  जैसा कोई अधिकारी न रहा अर्थात नाइब के पद को खत्म कर दिया बलबन ने चालीसा दल का दमन किया बलबन के शासन की सफलता का मुख्य श्रेय उसका गुप्तचर विभाग था गुप्तचर विभाग की स्थापना सामंतों की गतिविधियों पर निगरानी हेतु की गई थी।

मंगोलो का मुकाबला करने के लिए उसने एक सैन्य विभाग दीवाने अर्ज की स्थापना की उसने सिजदा और पाबोस प्रथा को अपने दरबार में फिर से शुरू करवाया जो मूलतः इरानी थी और जिन्हें गैर इस्लामी समझा जाता था इसके अतिरिक्त उसने ईरानी त्यौहार नौरोज प्रथा की स्थापना की ।

1279 में बंगाल के सूबेदार तुगरिल खां ने विद्रोह किया वह प्रथम गुलाम सरदार का विद्रोह था तुगरिल मुगीसुद्दीन की उपाधि ग्रहण की और अपने नाम के सिक्के चलाए तथा या बाद में विद्रोह को दबाया तथा विद्रोहियों को मृत्युदंड दिया।

उत्तर पश्चिमी सीमाओं पर मंगोलो के आक्रमण से बचने के लिए एक दुर्ग श्रंखला का निर्माण कराया तथा अपने जेष्ठ पुत्र शहजादा मोहम्मद को वहां का शासन सोंपा किंतु मंगोलो की एक प्रबल आक्रमण का सामना करते हुए वह मारा गया।

विख्यात कवि अमीर खुसरो जिसका उपनाम तूती ए हिंद (भारत का तोता) अमीर हसन ने अपना साहित्यिक जीवन शाहजहां मोहम्मद के समय शुरू किया था।

बलबन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र केकुबाद उसका उत्तराधिकारी हुआ जो एक अत्यंत विलासी एवम कामुक व्यक्ति था इसके परिणाम स्वरूप संपूर्ण प्रशासन अराजकता से ग्रस्त हो गया और अमीरों की उच्च आकांक्षाओं एवं संघर्षों की गिरफ्त में आ गया अमीरों के एक गुट के नेता आरिज ऐ मुमालिक मलिक फिरोज (जलालुद्दीन)केकुबाद की हत्या करके स्वयं गद्दी पर आसीन हो गया।

इस प्रकार दिल्ली सल्तनत में गुलाम वंश का अंत हो गया ।

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