अंतिम संशोधित (Last Updated): October 22, 2026
संवेग (Emotion) व्यक्ति की वह भावनात्मक उत्तेजित अवस्था है जिसके साथ शरीर में बदलाव आते हैं और जो व्यवहार में दिखाई देती है, जैसे क्रोध में चेहरा तमतमाना। शब्द लैटिन के Emovere (उत्तेजित करना) से बना है। शिशु में जन्म के समय केवल उत्तेजना होती है, और दो वर्ष तक लगभग सभी संवेग आ जाते हैं (ब्रिजेज)।

सोचिए, परीक्षा के दिन पेट में जो अजीब-सी घबराहट होती है, या दोस्त की सफलता पर जो चुभन होती है, यह सब संवेग हैं। हमारा व्यवहार केवल बुद्धि से नहीं चलता। कई बार गुस्से या डर में हम वह कर बैठते हैं जो शांत मन से कभी न करते। इसलिए मनोविज्ञान और शिक्षा-शास्त्र में संवेगात्मक विकास को बहुत महत्त्व दिया गया है, और CTET, REET, UPTET जैसी परीक्षाओं में यह टॉपिक नियमित रूप से आता है।
📌 संवेग का अर्थ और परिभाषाएँ
अंग्रेज़ी का Emotion शब्द लैटिन के Emovere से आया है, जिसका अर्थ है “उत्तेजित करना” या “हिला देना”। इसी आधार पर संवेग को व्यक्ति की उत्तेजित अवस्था कहा गया। अलग-अलग विद्वानों ने इसे अपने ढंग से कहा है:
- वुडवर्थ: व्यक्ति की उत्तेजित अवस्था को संवेग कहते हैं। आलोचक कहते हैं कि हर संवेग में उत्तेजना हो, यह ज़रूरी नहीं।
- जर्सील्ड: संवेग शब्द आवेश में आने, भड़कने और उत्तेजित होने की दशा बताता है।
- हरलॉक: संवेग व्यापक शब्द है, इसमें उत्तेजित मनोदशा और शांत संतुष्टि, दोनों आ जाती हैं।
- क्रो एंड क्रो: संवेग एक प्रभावशाली अनुभव है, जिसके साथ भीतरी समायोजन और शारीरिक-मानसिक उत्तेजना जुड़ी रहती है और जो बाहरी व्यवहार में झलकती है।
सीधे शब्दों में: संवेग एक गत्यात्मक आंतरिक समायोजन है, जो व्यक्ति की सुरक्षा और भलाई के लिए काम करता है।
✨ संवेगों की विशेषताएँ
- संवेग जन्म से मृत्यु तक जीवन में चलते रहते हैं।
- हर संवेग के साथ शारीरिक बदलाव जुड़े होते हैं, जैसे क्रोध में आँखें लाल होना, डर में पसीना आना।
- संवेगों का मूल-प्रवृत्तियों से घनिष्ठ संबंध है। जंगल में शेर दिखे तो भय जागता है और व्यक्ति भागता है।
- संवेग वैयक्तिक होते हैं, यानी हर व्यक्ति में अलग ढंग से प्रकट होते हैं।
- संवेग बार-बार आते हैं और उनका असर शरीर पर संवेग खत्म होने के बाद भी कुछ देर रहता है।
- संवेग के प्रभाव में व्यक्ति कभी-कभी ऐसे काम कर बैठता है जिनकी उससे उम्मीद नहीं होती।
- संवेग में आदमी तात्कालिक इच्छा पर ध्यान देता है और दूर के लक्ष्य भूल जाता है। इसलिए संवेग कभी प्रेरणा बनते हैं और कभी रुकावट।
🔥 संवेग कैसे पैदा होते हैं
- जब हमारी इच्छा, लक्ष्य या ज़रूरत की पूर्ति में रुकावट आती है, तो उद्दीपक बनते हैं जो संवेग जगाते हैं। कारण बाहरी भी हो सकते हैं और भीतरी भी।
- एक उद्दीपक एक समय में एक ही संवेग जगाता है, पर अलग समय या हालात में वही उद्दीपक अलग, यहाँ तक कि उलटा संवेग भी जगा सकता है। जैसे किसी के सिर पर हाथ फेरना एक जगह प्यार दर्शाता है और दूसरी जगह गुस्सा दिला सकता है।
- संवेग की गहराई और अवधि उद्दीपक की ताक़त और व्यक्ति की शारीरिक-मानसिक दशा पर निर्भर करती है।
- उम्र बढ़ने के साथ संवेग जगाने वाली परिस्थितियाँ बदलती हैं। शिशु को केवल कष्ट या आराम से फ़र्क पड़ता है, बड़े होने पर दायरा फैलता है।
👶 ब्रिजेज के अनुसार संवेगात्मक विकास
ब्रिजेज ने बताया कि शिशु में संवेग एक साथ नहीं, धीरे-धीरे अलग होते हैं। शुरुआत सिर्फ़ “उत्तेजना” से होती है।
| आयु | नए जुड़ने वाले संवेग | कुल मिलाकर |
|---|---|---|
| जन्म के समय | उत्तेजना | उत्तेजना |
| 3 माह | आनंद, कष्ट | उत्तेजना, आनंद, कष्ट |
| 6 माह | भय, घृणा, क्रोध | ऊपर के साथ भय, घृणा, क्रोध |
| 12 माह | उल्लास, प्रेम | ऊपर के साथ उल्लास, प्रेम |
| 18 माह | ईर्ष्या | ऊपर के साथ ईर्ष्या |
| 24 माह | हर्ष | सभी प्रमुख संवेग |
ध्यान रहे कि जन्म के समय शिशु में संवेग होते हैं या नहीं, इस पर मनोवैज्ञानिक एकमत नहीं हैं। वाटसन जैसे कुछ मनोवैज्ञानिक भय, क्रोध और स्नेह को जन्म से मानते हैं। ब्रिजेज और हरलॉक मानते हैं कि जन्म के समय केवल अस्पष्ट उत्तेजना होती है, जो आगे चलकर अलग-अलग संवेग बन जाती है।
🍼 शैशवावस्था में संवेगात्मक विकास
| संवेग | शैशव में रूप | कारण / संकेत |
|---|---|---|
| क्रोध | शिशु का सामान्य संवेग; ध्यान खींचने और इच्छा पूरी कराने का साधन | खेल में रुकावट, इच्छा न पूरी होना; रोना, हाथ-पैर पटकना, काटना, बाल खींचना |
| भय | जन्म के कुछ दिन से शुरू; तेज आवाज़ से डर | अपरिचित व्यक्ति, अँधेरा, अकेलापन, कर्कश आवाज़, डरावनी कहानी; शिशु अनुकरण से भी डरना सीखता है |
| आनंद | लगभग 3-4 माह में मुस्कान; 2 वर्ष तक हँसी | खिलौनों से खेलना; हँसना, उछल-कूद, चिल्लाना |
| ईर्ष्या | लगभग 2 से 5 वर्ष के बीच | माता-पिता किसी और बच्चे को ज़्यादा प्यार करें |
| स्नेह | लगभग 5-6 माह में माँ के प्रति | माँ को देखकर मुस्कराना, कपड़े पकड़ना; 3 वर्ष में साथियों के प्रति |
शुरुआत में शिशु संवेग को रोने, चिल्लाने या हाथ-पैर चलाने से जताता है। उम्र बढ़ने पर यह तीव्रता घटती जाती है।
🧒 बाल्यावस्था में संवेगात्मक विकास
बाल्यावस्था में संवेग ज़्यादा स्पष्ट और निश्चित हो जाते हैं, पर शैशव जैसे प्रचंड नहीं रहते। इसके तीन बड़े कारण हैं:
- समझ बढ़ती है: बच्चा उत्तेजित करने वाली परिस्थितियों को पहचानने लगता है।
- भाषा आती है: अब वह रोने-चीखने के बजाय शब्दों में भावना बताने लगता है।
- समाज का दबाव: कुछ संवेग उसे हँसी का पात्र बना देते हैं, घर-स्कूल में डाँट भी मिलती है, तो वह संवेग छुपाने लगता है। पर संवेगों को पूरी तरह दबाना ठीक नहीं।
| संवेग | बाल्यावस्था में रूप |
|---|---|
| क्रोध | प्रिय वस्तु छिनने, ज़रूरत पूरी न होने या किसी के गाली देने पर; रूठना, रोना, झुँझलाना। 10-12 वर्ष में मज़ाक उड़ाकर या ताना मारकर जताता है |
| भय | अपरिचितों से डर कम; असुरक्षा, असफलता और उपहास का डर बढ़ता है |
| ईर्ष्या | 6 वर्ष के बाद तेज; दूसरों की अच्छी आर्थिक स्थिति, पहनावे, ज़्यादा अंक या योग्यता से; परिवार में भाई-बहन से और स्कूल में पक्षपात दिखे तो शिक्षक से भी |
| हर्ष | 6-8 वर्ष में सफलता, घूमने, खेल और दोस्तों से मिलने पर; अभिव्यक्ति में शिष्टता आती है |
| प्रेम | समलिंगी दोस्तों के प्रति स्नेह; अपनी टोली के प्रति ज़्यादा लगाव |
🧑 किशोरावस्था में सांवेगिक विकास
किशोरावस्था लगभग 12-13 वर्ष से 18-19 वर्ष तक मानी जाती है। इस उम्र में संवेग तेज़ी से बदलते हैं। शारीरिक और मानसिक बदलाव इतनी तेज़ी से आते हैं कि किशोर को समायोजन की परेशानी होती है, क्योंकि बचपन के तरीक़े अब काम नहीं आते।
किशोर में संवेग जगाने वाले प्रमुख कारण:
- घर में माता-पिता से अच्छे संबंध न होना।
- इच्छाएँ पूरी न हो पाना, ख़ासकर पैसे की कमी में या साथी को ज़्यादा संपन्न देखकर।
- स्वयं को अयोग्य महसूस करना।
- परिवार, समाज, स्कूल जैसे नए माहौल में बड़ों की तरह समायोजन की उम्मीद।
- विपरीत लिंग के साथ व्यवहार को लेकर झिझक और उत्तेजना।
- स्कूल में असफलता और भविष्य की चिंता।
| संवेग | किशोरावस्था में रूप |
|---|---|
| क्रोध | सामाजिक कारणों से: मज़ाक, आलोचना, अपमान, पाबंदी, अनुचित सज़ा। गाली, निंदा या ताने से जताता है। यह क्षणिक न रहकर लंबे समय तक रह सकता है |
| भय | तीन तरह का: (1) वस्तुजन्य: साँप, कुत्ते, आग, पानी, तेज आवाज़ (2) सामाजिक: लोगों से मिलना, भीड़ में बोलना (3) स्वयं से जुड़ा: गरीबी, गंभीर बीमारी, असफलता। उम्र के साथ भय के कारण कम होते हैं |
| चिंता | असली से ज़्यादा काल्पनिक कारणों से; परीक्षा के अंक, रूप-रंग, लोकप्रियता, आगे चलकर नौकरी और विवाह की चिंता |
| ईर्ष्या | हमेशा सामाजिक कारण; ज़्यादा अंक पाने वाले या ऊँचे जीवन-स्तर वाले साथियों से |
| हर्ष / आनंद | नई स्थिति में खुद को ढाल लेना, हास्य, यह पता चलना कि चिंता बेकार थी, वरिष्ठता का भाव |
| स्नेह / प्रेम | विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण और स्नेह बढ़ता है |
🧩 संवेगात्मक विकास को प्रभावित करने वाले कारक
- स्वास्थ्य: स्वस्थ बच्चों का संवेगात्मक व्यवहार बीमार बच्चों की तुलना में ज़्यादा शिष्ट और स्थिर होता है।
- परिवार: माता-पिता में झगड़ा हो तो बच्चे पर बुरा असर पड़ता है। परिवार में बच्चों की संख्या भी असर डालती है।
- सामाजिक स्थिति: क्रो और क्रो के अनुसार ऊँची सामाजिक स्थिति के बच्चों में संवेगात्मक स्थिरता अपेक्षाकृत ज़्यादा मिलती है।
- मानसिक विकास: जिनकी बुद्धि ज़्यादा विकसित है, वे संवेगों पर बेहतर नियंत्रण रख पाते हैं।
- विद्यालय: पढ़ाई में अरुचि, परीक्षा में असफलता, टोली में तालमेल न बैठना और शिक्षक का व्यवहार, ये सब बच्चे के संवेग अस्थिर कर सकते हैं।
🏫 शिक्षा में संवेगों का महत्त्व और शिक्षक की भूमिका
- संवेग प्रेरणा और आनंद का स्रोत हैं, इसलिए पाठ को रोचक बनाने में इनका लाभ उठाना चाहिए।
- बच्चों के अच्छे संवेगों को दबाना नहीं चाहिए। दबाने से अस्थिरता और विद्रोह की भावना आती है।
- बच्चों को संवेग नियंत्रित करना सिखाइए, दबाना नहीं।
- कक्षा का माहौल डर वाला न हो। शिक्षक सहानुभूति और स्नेह से पेश आए।
- नाटक, वाद-विवाद, उत्सव जैसे कार्यक्रम रखें ताकि बच्चे खुलकर अपने को व्यक्त कर सकें।
- किशोरों को ज़िम्मेदारी वाले काम दें, क्योंकि वे आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं।
- मार्गान्तरीकरण (ऊर्जा को सही दिशा देना) और शोधन जैसी विधियाँ अपनाएँ, और साहित्य-कला की ओर प्रेरित करें।
इसे जोड़कर पढ़ें: संवेगात्मक बुद्धि, अभिवृद्धि और विकास, बुद्धि के सिद्धांत, अधिगम क्या है और व्यक्तित्व।
📝 अभ्यास प्रश्न (MCQ)
पहले खुद उत्तर सोचिए, फिर “उत्तर देखें” पर क्लिक कीजिए।
(2) Educare
(3) Motivus
(4) Sensus
👉 उत्तर देखें
Emovere का अर्थ है उत्तेजित करना, इसी से Emotion बना है।
(A) संवेग के साथ शारीरिक परिवर्तन जुड़े रहते हैं।
(B) संवेगों का मूल-प्रवृत्तियों से घनिष्ठ संबंध होता है।
(C) सभी व्यक्तियों में संवेग हमेशा एक जैसे प्रकट होते हैं।
(D) संवेग में व्यक्ति कभी-कभी अप्रत्याशित कार्य कर बैठता है।
(2) केवल A, B और D
(3) केवल B, C और D
(4) A, B, C और D सभी
👉 उत्तर देखें
C गलत है, क्योंकि संवेग वैयक्तिक होते हैं और हर व्यक्ति में अलग तरह से प्रकट होते हैं।
कारण (R): समझ और भाषा के विकास से बच्चा भावनाएँ शब्दों में बताने लगता है।
(2) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं है
(3) A सही, R गलत
(4) A गलत, R सही
👉 उत्तर देखें
भाषा और समझ बढ़ने से रोने-चीखने की जगह शब्दों से अभिव्यक्ति होती है, जिससे प्रचंडता घटती है।
| सूची I | सूची II |
|---|---|
| (A) जन्म के समय | (I) ईर्ष्या |
| (B) 6 माह | (II) उत्तेजना |
| (C) 12 माह | (III) भय, घृणा, क्रोध |
| (D) 18 माह | (IV) उल्लास, प्रेम |
(2) A-I, B-II, C-III, D-IV
(3) A-II, B-I, C-III, D-IV
(4) A-III, B-II, C-IV, D-I
👉 उत्तर देखें
जन्म पर उत्तेजना; 6 माह पर भय, घृणा, क्रोध; 12 माह पर उल्लास, प्रेम; 18 माह पर ईर्ष्या।
(A) ईर्ष्या
(B) उत्तेजना
(C) भय, क्रोध, घृणा
(D) आनंद और कष्ट
(2) B, C, D, A
(3) D, B, C, A
(4) B, D, A, C
👉 उत्तर देखें
पहले उत्तेजना (जन्म), फिर आनंद-कष्ट (3 माह), भय-क्रोध-घृणा (6 माह), और अंत में ईर्ष्या (18 माह)।
(2) 3 से 6 वर्ष
(3) 6 से 12 वर्ष
(4) 12-13 से 18-19 वर्ष
👉 उत्तर देखें
किशोरावस्था लगभग 12-13 वर्ष से 18-19 वर्ष तक की मानी जाती है।
❓ संवेग पर सवाल-जवाब (FAQ)

एम.ए., बी.एड. (नेट हिंदी), कॉलेज व्याख्याता, श्रीगंगानगर (राजस्थान)। हिंदी साहित्य चैनल के संचालक।
