prithvi raj chauhan || पृथ्वीराज चौहान || rajasthan history

आज की पोस्ट में हम राजस्थान इतिहास के अंतर्गत पृथ्वीराज चौहान(prithvi raj chauhan) के बारे में पढेंगे ,आप इस टॉपिक को अच्छे  से तैयार करें 

पृथ्वीराज चौहान prithvi raj chauhan (1177 ई. -1192 ई.)

मुहम्मद गोरी के भारत पर आक्रमणों के समय दिल्ली व अजमेर पर पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) का शासन था जो इतिहास में ’रायपिथौरा’ के नाम से प्रसिद्ध है। पृथ्वीराज का जन्म 1168 ई. में हुआ था। वह अपने पिता सोमेश्वर की म्त्यु के बाद मात्र 11 वर्ष की आयु में चौहान साम्राज्य का उत्तराधिकारी बना। पृथ्वीराज की माँ कर्पूरदेवी कुशल राजनीतिज्ञा थी। इस कारण उसने प्रधानमंत्री कदम्बवास और सेनापति भुवनमल्ल की सहायता से राज्य का शासन आसानी से संभाल लिया।

एक वर्ष तक माता के संरक्षण में रहने के बाद 1178 ई. में पृथ्वीराज ने शासन की बागडोर अपने हाथों में ले ली। शीघ्र ही उसने उच्च पदों पर अपने विश्वसनीय अधिकारियों की नियुक्ति कर विजय नीति को क्रियान्वित करने का बीङा उठाया। इतिहासकार गोपीनाथ शर्मा के अनुसार इस विजय नीति के तीन पक्ष थे – स्वजनों के विरोध से मुक्ति पाना, पङौसी राज्यों का दमन तथा विदेशी शत्रुओं का मुकाबला।

पृथ्वीराज चौहान की विजयें – पृथ्वीराज को अल्पव्यस्क देख कर उसके चाचा अपरगांग्य ने शासक बनने के लिए विद्रोह कर दिया। पृथ्वीराज ने उसे परास्त कर उसकी हत्या कर डाली किन्तु विरोधी दल शांत नहीं हुआ। अपरगांग्य के छोटे भाई नागार्जुन ने विद्रोह का बिगुल बजाते हुए गुरूग्राम (गुडगांव) पर अधिकार कर लिया। पृथ्वीराज द्वारा सेना भेजने पर नागार्जुन कुछ समय तक गुरूग्राम (गुडगांव) को बचाने का प्रयास अवश्य किया किन्तु पृथ्वीराज की सेना सफल रही।

विद्रोहियों को मौत के घाट उतार दिया गया और उनके सिर नगर की प्राचीरों पर लटका दिये गये जिससे भविष्य मैं अन्य शत्रु उनके विरोध का साहस न कर सकें। 1182 ई. में पृथ्वीराज ने गुङगांव व हिसार के आसापास बसी हुई भण्डानक नामक उपद्रवी जाति को पराजित कर अपने राज्य की उत्तरी सीमा को सुरक्षित किया। समसामयिक लेखक जिनपति सूरि ने पृथ्वीराज द्वारा भण्डनकों दमन का उल्लेख किया है।

प्रारम्भिक सफलताओं के बाद पृथ्वीराज ने प्राचीन भारतीय शासकों के समान दिग्विजय नीति अपनाने का फैसला किया। भण्डानकों के दमन के बाद उसकी सीमाएँ चन्देलों के महोबा राज्य से मिलने लग गई थी। अपने कुछ सैनिकों की हत्या का बदला लेने के लिए पृथ्वीराज ने 1182 ई. में महोबा राज्य पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में चंदेल शासक परमर्दीदेव के दो सेनापति आल्हा व ऊदल लङते हुए मारे गए। विजयी पृथ्वीराज पंजुनराय को महोबा का अधिकारी नियुक्त कर लौट आया।

पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज ने आबू की राजकुमारी इच्छिनी से विवाह कर गुजरात के चालुक्य शासक भीमदेव के साथ विवाह का इच्छुक था। डाॅ. गोपीनाथ शर्मा के अनुसार दोनों शासकों के बीच संघर्ष का वास्तविक कारण उनके राज्यों की सीमाएँ मिलना और दोनों शासकों की महत्त्वाकांक्षायें थी।

दोनों शासकों के बीच छोटी-मोटी झङपों के बाद जगदेव प्रतिहार की मध्यस्थता से संधि हो गई किन्तु इस संधि से परम्परागत वैमन्य समाप्त नहीं हुआ और चौहान -चालुक्य द्वेष भीतर ही भीतर सुलगता रहा।
पृथ्वीराज के पूर्व में स्थित कन्नौज के गहङवाल राज्य का शासन इस समय जयचन्द्र था।

दिल्ली पर नियन्त्रण को लेकर चौहानों और गहङवालों के बीच परम्परागत वैमनस्य चला रहा था। पृथ्वीराज दिग्विजय योजना को पूर्णता प्रदान करने के लिए कन्नौज को अपने राज्य में मिलाना चाहता था, वहीं जयचन्द्र भी उसकी होङ में विजय योजनाएँ बना रहा था। इस कारण दोनों के बीच संघर्ष होना अवश्यम्भावी था।

पृथ्वीराज द्वारा जयचन्द्र की पुत्री संयोगिता का बलपूर्वक अपहरण कर विवाह किया जाना दोनों शासकों के बीच संघर्ष का चरमोत्कर्ष था। अपनी पुत्री के अपहरण से जयचन्द्र पृथ्वीराज का पक्का शत्रु बन गया और बदला लेने का अवसर ढूंढने लगा। एक प्रचलित मत के अनुसार उसने सहायता का आश्वासन देकर मुहम्मद गौरी को पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया। पुरातन प्रबन्ध संग्रह के अनुसार गौरी के हाथों पृथ्वीराज की पराजय की खबर सुनकर जयचन्द्र ने अपनी राजधानी में खुशियाँ मनाई थी।

संयोगिता की कहानी – चन्दबरदाई की रचना ’पृथ्वीराज रासो’ के अनुसार जयचन्द्र और पृथ्वीराज चौहान के बीच संघर्ष का कारण पृथ्वीराज चौहान द्वारा जयचन्द्र की पुत्री संयोगिता का अपहरण कर उसके साथ विवाह करना था। कथानक के अनुसार पृथ्वीराज चौहान(prithvi raj chauhan) और जयचन्द्र की पुत्री संयोगिता के बीच प्रेम था किन्तु जयचन्द्र पृथ्वीराज के साथ शत्रुतापूर्ण सम्बन्धी के चलते अपनी पुत्री संयोगिता का विवाह किसी अन्य राजा के साथ करना चाहता था।

इस उद्देश्य से उसने राजसूय यज्ञ के साथ संयोगिता के स्वयंवर का आयोजन किया। इस आयोजन में उसने पृथ्वीराज को छोङकर सभी प्रमुख राजा-महाराजाओं को आमन्त्रित किया। इतना ही नहीं जयचन्द्र ने पृथ्वीराज को अपमानित करने के लिए उसकी मूर्ति बनवाकर द्वारपाल के स्थान पर लगवा दी।

स्वयंवर के समय जब सभी राजा-महाराजा संयोगिता की वरमाला का इन्तजार कर रहे थे उस समय संयोगिता ने पृथ्वीराज की मूर्ति के गले में वरमाला डाल दी। इसी वक्त पृथ्वीराज अपनी सेना सहित घटनास्थल पर पहुँच गया और संयोगिता को उठाकर ले गया। जयचन्द्र के सैनिकों से पृथ्वीराज को रोकने का प्रयास किया किन्तु वे असफल रहे।

डाॅ. आर. एस. त्रिपाठी, गौरीशंकर हीराचन्द और विश्वेश्वरनाथ रेऊ जैसे इतिहासकारों ने इसकी ऐतिहासिकता को मात्र प्रेमाख्यान कहकर अस्वीकार कर दिया है जबकि डाॅ. दशरथ शर्मा ने ’दि अर्ली चौहान डाइनेस्टीज’ में संयोगिता की घटना को ऐतिहासिक तथ्य स्वीकार किया है।

पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के बीच संघर्ष –

गजनी का गवर्नर नियुक्त होने के बाद मुहम्मद गौरी ने 1175 ई. में मुल्तान पर आक्रमण कर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने गुजरात, सियालकोट और लाहौर के युद्धों में विजय हासिल कर अपनी शक्ति का परिचय दिया।

राजस्थानी स्रोतों के अनुसार इस दौरान उसकी पृथ्वीराज चौहान के साथ अनेक बार लङाइयाँ हुई और हर बार उसे पराजय का सामना ही करना पङा। पृथ्वीराज रासो में 21 तथा हम्मीर महाकाव्य में सात बार गौरी पर पृथ्वीराज की विजयों का दावा किया गया है।

दोनों के बीच दो निर्णायक युद्ध हुए। 1191 ई. में लाहौर से रवाना होकर मुहम्मद गौरी तबरहिन्द नामक स्थान पर अधिकार करते हुए तराइन तक पहुँच गया। यहाँ दोनों पक्षों के बीच भयंकर युद्ध हुआ जिसमें पृथ्वीराज चौहान के दिल्ली सामंत गोविन्दराज ने अपनी बर्छी के वार से मुहम्मद गौरी को घायल कर दिया। घायल गौरी अपनी सेना सहित गजनी भाग गया। पृथ्वीराज ने तबरहिन्द पर अधिकार कर काजी जियाउद्दीन को बंदी बना लिया जिसे बाद में एक बङी धनराशि के बदले रिहा कर दिया गया।

एक वर्ष बाद मुहम्मद गौरी अपनी सेना के साथ तराइन के मैदान में पुनः आ धमका। पृथ्वीराज उसका मुकाबला करने पहुँच गया किन्तु गौरी ने इस बार अपने शत्रु को संधि वार्ता के झांसे में फंसा लिया। कई दिन तक संधि वार्ता चलने के कारण चौहान सेना निश्चित होकर आमोद-प्रमोद में डूब गई। इसका फायदा उठाकर गौरी ने एक रात्रि अचानक आक्रमण कर दिया।

राजपूत सेना इस अप्रत्याशित आक्रमण को झेल नहीं पाई और पराजित हुई। पराजित पृथ्वीराज चौहान को सिरसा के पास सरस्वती नामक स्थान पर बंदी बना लिया गया।

⇒ पृथ्वीराज रासो के अनुसार बंदी पृथ्वीराज को गौरी अपने साथ गजनी ले गया जहाँ शब्द भेदी बाण के प्रदर्शन के समय पृथ्वीराज ने गौरी को मार डाला। जबकि समकालीन इतिहासकार हसन निजामी के अनुसार तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गौरी के अधीनस्थ शासक के रूप में अजमेर पर शासन किया था।

इसामी के कथन के पक्ष में एक सिक्के का भी संदर्भ दिया जाता है जिसके एक तरफ मुहम्मद बिन साम और दूसरी तरफ पृथ्वीराज नाम अंकित है।

पृथ्वीराज चौहान(prithvi raj chauhan) की पराजय के कारण – विजेता होने के बावजूद पृथ्वीराज चौहान में दूरदर्शिता व कूटनीति का अभाव था। उसने अपने पङौसी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्व सम्बन्ध स्थापित नहीं किये अपितु उनके साथ युद्ध करके शत्रुता का मोल ले ली। इसी कारण मुहम्मद गौरी के विरुद्ध संघर्ष में उसे उनका कोई सहयोग नहीं मिला। 1178 ई. में जब मुहम्मद गौरी ने गुजरात के शासक भीमदेव द्वितीय पर आक्रमण किया था, उस समय पृथ्वीराज ने गुजरात की कोई सहायता न कर एक भूल की।

तराइन के प्रथम युद्ध में पराजित होकर भागती तुर्क सेना पर आक्रमण न करना भी उसकी एक भयंकर भूल सिद्ध हुई। यदि उस समय शत्रु सेना पर प्रबल आक्रमण करता तो मुहम्मद गौरी भारत पर पुनः आक्रमण करने के बारे में कभी नहीं सोचता। संयोगिता के साथ विवाह करने के बाद उसने राजकार्यों की उपेक्षा कर अपना जीवन विलासिता के व्यतीत करना प्रारम्भ कर दिया था।

पृथ्वीराज चौहान(prithvi raj chauhan) का मूल्यांकन – पृथ्वीराज एक वीर और साहसी शासक था। अपने शासनकाल के प्रारम्भ से ही वह युद्ध करता रहा जो उसके अच्छे सैनिक और सेनाध्यक्ष होने को प्रमाणित करता है। अनेक युद्धों में सफलता प्राप्त कर उसने ’दलपंगुल’ (विश्वविजेता) की उपाधि धारण की। तराइन के द्वितीय युद्ध में मुहम्मद गौरी द्वारा छल-कपट का सहारा लेने से पूर्व वह किसी भी लङाई में नहीं हारा था।

एक विजेता के साथ-साथ वह विद्यानुरागी था। इसके दरबार में अनेक विद्वान रहते थे जिनमें – विद्यापति गौङ, वागीश्वर, जनार्दन, जयानक, विश्वरूप, आशाधर आदि प्रमुख थे। चन्दरबरदाई उसका राजकवि था जिसका ग्रंथ ’पृथ्वीराज रासो’ हिन्दी साहित्य का प्रथम महाकाव्य’ माना जाता है।

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