बहुव्रीहि समास अर्थ व उदाहरण || Hindi grammar || हिंदी व्याकरण

बहुव्रीहि समास

दोस्तो आज की पोस्ट में बहुव्रीहि समास अर्थ व उदाहरण को 200 उदाहरणों के माध्यम से समझाया गया है ,जो आपके लिए उपयोगी साबित होंगे

बहुव्रीहि समास अर्थ व उदाहरण

Bahuvreehi Samaas

बहुव्रीहि समास परिभाषा :

’’अन्य पद प्रधानम् सः बहुव्रीहि’’ अर्थात् जिस समस्त पद में कोई पद प्रधान नहीं होता, और समस्तपद किसी अन्य के विशेषण के रूप में प्रयुक्त होता है, उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं। इस समास में शब्द अपने अर्थ को इंगित न कर किसी ओर के लिए प्रयुक्त होते है।

बहुव्रीहि समास के उदाहरण :

  • नाकपति- वह जो नाक (स्वर्ग) का पति है- इन्द्र
  • विषधर- विष को धारण करने वाला- साँप
  • व्रजायुध- वह जिसके वज्र का आयुध है- इन्द्र
  • सहस्त्राक्ष- वह जिसके सहस्त्र (हजार) अक्षि (आँखें) हैं- इन्द्र
  • चक्रधर- चक्र धारण करने वाला- श्री कृष्ण
  • पतझङ- झङते हैं पत्ते जिसमें वह ऋतु- बसंत
  • दीर्घबाहु- दीर्घ हैं बाहु जिसके- विष्णु
  • पंचशर- वह जिसके पाँच (पाँच फूलों के) शर हैं- कामदेव
  • मकरध्वज- वह जिसके मकर का ध्वज है- कामदेव
  • पतिव्रता- एक पति का व्रत लेने वाली- वह स्त्री
  • इंदुशेखर- वह जिनके इंदु (चन्द्रमा) शेखर (सिर का आभूषण) है- शिव
  • पशुपति- पशुओं का पति (स्वामी) – शिव
  • महेश्वर- महान है जो ईश्वर – शिव
  • वाग्देवी- वह जो वाक् (भाषा) की देवी है- सरस्वती
  • पद्मनाभ- वह जिसकी नाभि में पद्म (कमल) है- विष्णु
  • दिगम्बर- दिशाएँ ही हैं वस्त्र जिसके -शिव
  • हृषीकेश- वह जो हृषीक (इंद्रियों) के ईश हैं- विष्णु/कृष्ण
  • शेषशायी- वह जो शेष (नाग) पर शयन करते हैं- विष्णु
  • हिरण्गर्भ- वह जिसका हिरण्य (सोने) का गर्भ है- ब्रह्मा, चतुरानन, चतुर्मुख आदि
  • प्रफुल्ल कमल- खिले हैं कमल जिसमें- वह तालाब
  • धनंजय- वह जो धन (पृथ्वी, भौतिक सपंदा आदि) का जय करता है- अर्जुन
  • सप्तऋषि- वे जो ऋषि सात (उनके नाम निश्चित हैं) हैं वे- सात ऋषि विशेष
  • सूर्यपुत्र- वह जो सूर्य का पुत्र है- कर्ण
  • लोकनायक- लोक का नायक- जयप्रकाश नारायण
  • सिंहवाहिनी- वह जिनके सिंह का वाहन है- दुर्गा
  • मयूरवाहन- वह जिनके मयूर का वाहन है- कार्तिकेय
  • अनंग- बिना अंग का- कामदेव
  • शैलनंदिनी- वह जो शैल (हिमालय) की नंदिनी (पुत्री) हैं- पार्वती
  • दशरथनंदन- वह जो रशरथ के नंदन है- राम
  • नीलकण्ठ- नीला है कण्ठ जिनका- शिव
  • वारिज- वह जो वारि से जन्मता है- कमल
  • नीरद- वह जो नीर देता है- बादल, वारिद, जलद, पयोद, अंबुद
  • कपीश्वर- कपि (वानरों) का ईश्वर है जो- हनुमान
  • सुधाकर- वह जो सुधा (अमृत) को संभव करता है- चन्द्रमा
  • हिमाद्रि- जो हिम का अद्रि (पर्वत) है वह – हिमालय
  • त्रिपिटक- तीन पिटकों (रचना संग्रह) का संग्रह (बौद्ध धर्म के ग्रथ विशेष)
  • त्रिवेणी- तीन वेणियों (नदियों) का संगम स्थल- प्रयाग
  • वसुंधरा – जो वसु (रत्न, धन) को धारण करती है- पृथ्वी
  • अष्टाध्यायी- जिसके आठ अध्याय हैं/आठ अध्यायों वाली- पाणिनी रचित संस्कृत व्याकरण
  • हलधर- हल को धारण करने वाला- बलराम
  • त्रिफला- तीन फलों का समूह- हरङे, बहङे, आँवला
  • पंचवटी- पाँच वटवृक्षों के समूहवाला स्थान- मध्यप्रदेश के स्थान विशेष
  • दशमुख- दस हैं मुख जिसके- रावण
  • गुरुद्वारा- गुरु का द्वार (स्थान) सिक्खों का धर्मस्थान
  • रामायण- राम का अयन (आश्रय)- वाल्मीकि रचित काव्य
  • पंचानन- पंच हैं मुख जिसके- शिव
  • गुरुमुखी- गुरु के मुख से निकली हुई- पंजाबी की लिपि का नाम
  • प्राप्तोदक- प्राप्त है उदक जिसे- जिसका तर्पण हो गया है
  • कनफटा- जिसके सहस्त्र (हजार) आनन (मुँह) हैं- विष्णु, शेषनाग
  • षट्पद- षट्पद (पैर) वाला- भ्रमर

बहुव्रीहि समास अर्थ व उदाहरण

  • गिरिधर- गिरि को धारण करने वाला- श्रीकृष्ण
  • जयपुर- जयसिंह द्वारा बसाया गया पुर, एक शहर विशेष का नाम
  • दूरदर्शन- दूर का दर्शन- भारत सरकार का टेलीविजन उपक्रम
  • अनुचर- जो चलने वाले के पीछे चले- सेवक
  • षड्दर्शन- षट् दर्शनों का सूमह- सांख्य, न्याय आदि छह विशिष्ट भारतीय दर्शन
  • पंचशील- पंचशीलों का समूह
  • वज्रांग- व्रज के समान अंग है जिसके- शिव
  • चतुर्भुज- चार है भुजाएँ जिसकी- विष्ण्ुा
  • चन्द्रचूङ- चन्द्र (चन्द्रमा) है चूङ (ललाट) पर जिसके- शिव
  • रघुनन्दन- रघु का नन्दन है जो -राम
  • चन्द्रमौलि- चन्द्र है मौलि (मस्तक) पर जिसके- शिव
  • अंजनिनंदन- अंजनि का नंदन (पुत्र) है जो- हनुमान
  • अनुमति- मति (बुद्धि) के अनुसार- आज्ञा
  • पनवाङी- पान की वाङी- पान विक्रेता
  • निगोङा- बिना गोङ (पैर) के- निराश्रित
  • सिरदर्द- सिर में दर्द- परेशानी
  • अव्यय- जिसका व्यय न हो- अपरिवर्तनकारी शब्दों की एक व्याकरणिक कोटि
  • छुटभैया- जो भैया छोटा है- किसी बङे नेता से जुङा हुआ छोटा नेता
  • महाकाव्य- जो काव्य महान है- प्रबंधकाव्य का एक रूप
  • सिरफिरा- जिसका सिर फिरा हुआ है- सनकी व्यक्ति
  • खङीबोली- जो बोली खङी हो- हिन्दी भाषा की एक बोली का नाम
  • इकतारा- जिसके एक तार हो- एक वाद्ययंत्र का नाम
  • छमाही- छह माह के बाद आनेवाली (द्विगु समास भी)- हिन्दुओं में किसीकी मृत्यु के छह माह बाद होने वाला कर्मकांड
  • चहुँमुखी- जिसके चार मुख हों- समग्र
  • छप्पय- जिसके छह पद हों- एक छंद विशेष
  • सफेदपोश- जिसके पोश (वस्त्र) सफेद हों- शारीरिक श्रम से रहित नौकरशाह, राजनेता आदि
  • चारपाई- जिसके चार पाए हों- खाट
  • तीस मार खाँ- तीस को मारकर खाने वाला- विशेष शूरवीर
  • तिलांजलि- तिलों की अंजलि- किसी संबंध से मुक्त हो जाना
  • सप्तशती/सतसई- सात सौ का समूह- सात सौ छंदों का काव्य
  • श्वेतपत्र- जो पत्र श्वेत (रंग का) हो- यथास्थिति को बताने वाला सरकारी आलेख
  • अद्वितीय- ऐसा जिसके समान द्वितीय न हो- निराला
  • सचेत- जो चेत (चेतना) के साथ है- सावधान
  • दत्तचित्त- चित्त को (किसी काम में) दिया हुआ- तल्लीन
  • अनाथ- वह जिसका कोई नाथ नहीं है- बेसहारा
  • निर्मल- वह जो मलरहित है- स्वच्छ
  • जितेन्द्रिय- जिसने इंद्रियाँ जीती हैं- कामनारहित
  • तपोधन- तप ही है धन जिसका -तपस्वी
  • सिंहावलोकन- सिंह की तरह अवलोकन- आगे बढ़ते हुए पीछे की बातों पर गौर कर लेना
  • हितोपेदेश- हित के लिए उपेदश- संस्कृत की पुस्तक का नाम
  • लोकन- अवलोकन- मोटे तौर पर व्यापक चीजों को देखना
  • राजरोग- रोगों में राजा- असाध्य रोग, यक्ष्मा
  • सोमरस- सोम का रस- नशीला द्रव, मदिरा
  • ज्ञानवृद्ध- जो ज्ञान से वृद्ध हो- विद्वान्
  • मंदोदरी- उदर जिसका मंद हो वह स्त्री- रावी की पत्नी
  • दुमुँहा- जिसके दो मुँह हों- दोगला
  • शाखामृग- शाखाओं पर दौङने वाला मृग- वानर
  • व्रजपाणि- वह जिसके पाणि (हाथ) में व्रज है- इन्द्र
  • शचीपति- वह जो शची का पति है- इन्द्र
  • ब्रजवल्लभ- वह जो ब्रज का वल्लभ है- कृष्ण

बहुव्रीहि समास अर्थ व उदाहरण

  • नंदनंदन- वह जो नंद का नंदन (पुत्र) है- कृष्ण
  • मुरारि- वह जो मुर (राक्षस का नाम) के अरि (शत्रु) हैं- कृष्ण
  • कुसुमशर- वह जिसके कुसुम के शर (बाण) हैं- कामदेव
  • पुष्पधन्वा- वह जिसके पुष्पों का धनुष है- कामदेव
  • रतिकांत- वह जो रति का कांत (पति) है- कामदेव
  • आशुतोष- शीघ्र (आशु) तुष्ट हो जाते हैं जो- शिव
  • तिरंगा- तीन रंगो वाला- राष्ट्रध्वज
  • अंशुमाली- अंशु है माला जिसकी- सूर्य
  • महात्मा- महान् है आत्मा जिसकी- ऋषि
  • वक्रतुण्ड- वक्र है तुण्ड जिसकी- गणेश
  • पुंडरीक- वह जो कमल के समान है- विष्णु
  • गरुङध्वज- वह जिनके गरुङ का ध्वज हैं- विष्णु
  • श्रीश- वह जो श्री (लक्ष्मी) के ईश हैं- विष्णु
  • घनश्याम- जो घन के समान श्याम हैं- श्रीकृष्ण
  • वाचस्पति- वह जो वाक्का पति है- बृहस्पति
  • युधिष्ठिर- जो युद्ध में स्थिर रहता है वह – धर्मराज
  • महावीर- महान है जो वीर- भगवान महावीर व हनुमान
  • चतुरानन- वह जिनके चार आनन हैं- ब्रह्मा
  • षण्मुख- वह जिनके षट् मुख हैं- कार्तिकेय
  • षडानन- वह जिनके षट् आनन हैं- कार्तिकेय
  • रेवतीरमरण- वह जो रेवती के साथ रमण करते हैं- बलराम
  • हिमतनया- वह जो हिम की तनया (पुत्री) हैं- पार्वती
  • एकदन्त- एक दंत (दाँत) हैं जिसके- गणेश
  • रघुपति- वह जो रघु के पति हैं- राम
  • नीरज- वह जो नीर से जन्मता है- कमल
  • पीताम्बर- पीत (पीले) हैं वस्त्र जिसके- विष्णु
  • दिवाकर- दिन को करने (संभव बनाने) वाला- सूर्य
  • इंद्रधनुष- वह जो इन्द्र का धनुष है- बरसात में बनने वाला सतरंगी अर्धवृत्त
  • नरेश- जो नरों का ईश है वह- राजा (भूपति, महीपति, भूपाल, नृपति आदि)
  • वीणापाणि- वीणा है जिसके पाणि (हाथ) में- सरस्वती
  • चक्षुश्रवा- जो चक्षु से श्रवण- कार्य करता है- साँप
  • देवराज- देवों का राजा है जो- इन्द्र
  • रत्नगर्भा- वह जिसके गर्भ में रत्न हैं- पृथ्वी
  • नवग्रह- नव (नौ) ग्रहों का समूह- मंगल, बुध आदि विशिष्ट नौ ग्रह
  • पंजाब- पाँच आबों (नदियों) का क्षेत्र- राज्य विशेष
  • बारहसींगा- बारह सींगोंवाला पशु-हिरण की एक जाति विशेष का नाम (जरूरी नहीं कि उसके निश्चित बारह ही सींग हों)
  • दुर्वासा- बुरे वस्त्र पहनने वाला- एक ऋषि विशेष का नाम
  • चक्रपाणि- चक्र है पाणि (हाथ) में जिसके- विष्णु
  • पंचतंत्र- पंच प्रकार का तंत्र- संस्कृत की पुस्तक विशेष
  • पंचामृत- पाँच प्रकार का अमृत- दूध, दही, शक्कर, गोमल, एवं गोमूत्र का रसायन विशिष्ट
  • पद्मासना- पद्म है आसन जिसका- लक्ष्मी
  • सहस्त्रानन- जिसके सहस्त्र (हजार) आनन (मुँह) है- विष्णु, शेषनाग
  • मनोज- मन से जन्म लेन वाला- कामदेव
  • लोकसभा- लोक की सभा- भारतीय संसद का निम्न सदन
  • भूदान- भू का दान- विनोबा भावे द्वारा चलाया गया एक विशेष आंदोलन
  • त्रिशूल- तीन शूलों का समूह- शिव के अस्त्र का नाम
  • अष्टछाप- अष्ट लोगों की छाप- मध्यकाल में सूरदास आदि आठ कृष्णभक्त कवियों का समूह
  • त्रिशंकु- किसी अभियान में बीच में लटके रहने वाला- अयोध्या के एक राजा विशेष का नाम
  • अनुकूल- कूल (किनारे) की ओर- सहयोगी, समर्थक
  • त्रिलोचन- तीन है लोचन जिसके- शिव
  • शूलपाणि- शूल है पाणि में जिसके – शिव
  • लम्बोदर- लम्बा है उदर जिसका- गणेश
  • पुण्डरीकाक्ष- पुण्डरीक (कमल) के समान अक्षि (आँखें) है जिसकी- विष्णु
  • सूतपुत्र- सूत (सारथी) का पुत्र है जो – कर्ण
  • चतुरानन- चार है आनन जिसके- ब्रह्मा
  • पददलित- पद द्वारा दलित- समाज का दलित वर्ग
  • प्रतिकूल- कूल (किनारे) के विपरीत- विरोधी
  • राजपूत- राजा का पुत्र- एक जाति विशेष का नाम
  • कठघरा- काठ का घेरा
  • निशाचर- निशा में चलने वाला- राक्षस
  • डंडीमार- डंडी से मारने वाला- तराजू से कम तोलने वाला व्यापारी
  • महाजन- जा जन महान है- वैश्य
  • कलमुँहा- जिसका मुँह काला है- लांछित व्यक्ति
  • चलतापुर्जा- जो पुर्जा चलता हुआ है- चालाक
  • चौमासा- चार मास का समूह- वर्षा ऋतु के विशेष चार मास
  • दुरंगी- दो रंगवाली- दो तरह के व्यवहारवाली क्रिया
  • चौपाई- जिसके चार पाए (पद) हों- एक छंद विशेष का नाम
  • दोगला- जिसके दो गले हों- अपनी बात पर न टिकने वाला
  • चौपाल – जिसके चार पाल हो- गाँव में बैठने का सामूहिक स्थल
  • पंचांग- जिसके पंच अंग हों- ज्योतिष की एक पुस्तक विशेष
  • सतमासा- जो सात मास का हो- गर्भ में सात मास ही रहकर जन्म लेने वाला बालक
  • सप्तपदी- सप्त पद चलने की क्रिया- हिन्दू विवाह की एक रीति विशेष
  • छिन्नमस्ता- जिसका मस्तक छिन्न हो- देवी का एक रूप
  • सजग- जा जाग के साथ है- सावधान
  • मक्खीचूस- मक्खी को चूसने वाला- कंजूस
  • सहृदय- जो हृदय सहित है- संवदेनशील
  • निर्जन- जो स्थान जाने से रहित है- सुनसान
  • सफल- जो फल के साथ है- उत्तीर्ण
  • दुधमुँहा- जिसके मुँह में दूध है- छोटा बालक
  • नकटा- नाक है कटा जिसका- बेशर्म
  • चौकन्ना – चार है कान जिसके- सजग
  • विहंगाव- विंहग की तरह
  • सूरदास- सूर (सूर्य) का दास- हिन्दी के कवि का नाम
  • लोकपाल- लोक का पालन करने वाला- मंत्री
  • प्रज्ञाचक्षु- जिसके प्रज्ञा के चक्षु हों- चक्षुहीन
  • उधेङ-बुन- उधेङना और बुनना- उलझन, सोच-विचार
  • तटस्थ- जो तट पर स्थित हों- निष्पक्ष, उदासीन
  • दुमुँही- जिसके दो मुहँ हों (मादा)- साँप की जाति विशेष

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